टांगरडीह (वर्तमान भारत) रोहित कुमार
टांगरडीह क्षेत्र के ग्रामीण अंचलों में मंगलवार को भाई- बहन के अटूट प्रेम, सुख-समृद्धि और प्रकृति के प्रति आस्था का प्रतीक करमा एकादशी यानी करम पर्व पूरे उत्साह और पारंपरिक रीति- रिवाजों के साथ मनाया गया। भादो शुक्ल पक्ष की एकादशी के अवसर पर गांव -गांव में करम देवता की पूजा -अर्चना की गई ।पर्व को लेकर ग्रामीण क्षेत्रों में सुबह से ही उत्साह का माहौल रहा। खासकर युवतियों ने अपने भाईयों की लंबी उम्र,अच्छे स्वास्थ्य सुख-समृद्धि और परिवार की खुशहाली की कामना करते हुए व्रत रखा।करमा पर्व केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं है बल्कि यह ग्रामीण जीवन, लोकपरंपरा, प्रकृति और पारिवारिक रिश्तों को एक साथ जोड़ने वाला महत्वपूर्ण पर्व माना जाता है। यही वजह है कि टांगरडीह क्षेत्र के गांवों में इस पर्व की तैयारी कई दिन पहले से शुरू हो जाती है।भादो चतुर्थी से ही कुंवारी कन्याओं द्वारा पर्व की परंपरागत शुरुआत की जाती है। कन्याएं नदी अथवा जलस्रोत में स्नान कर वहां से रेत मिट्टी लाती हैं और उसमें विभिन्न अनाजों का जावा तैयार करती है। इसके बाद सात दिनों तक जावा की सेवा, पूजा और देखभाल की जाती है। सात दिनों तक चलने वाली यह परंपरा ग्रामीण संस्कृति में करमा करमा पर्वके प्रति श्रद्धा और सामूहिक सहभागिता को दर्शाती है। टांगरडीह क्षेत्र में करमा एकादशी के दिन ग्रामीण पंरपरा के अनुसार भाइयों द्वारा करम वृक्ष के पास पहुंचकर विधि -विधान से पूजा अर्चना की गई। पूजा के बाद करम वृक्ष की डाली को परंपरागत तरीके से काटकर ढोल, नगाड़े और मांदर की थाप के बीच गांव के उस स्थान तक लाया गया, जहां प्रत्येक वर्ष करमा पूजा का आयोजन किया जाता है। करम डाली को निर्धारित स्थान पर विधि विधान से स्थापित किया गया। इसके बाद व्रत रखीं कन्याओं और महिलाओं ने शाम करीब आठ बजे करम डाली की पूजा अर्चना कर परिवार और भाइयों की सुख-समृद्धि की कामना की। पूजा के दौरान करम डाली को प्रकृति और देवता का प्रतीक मानकर उसकी आराधना की गई। ग्रामीणों ने प्रकृति के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करते हुए सुखी जीवन, परिवार की खुशहाली और आपसी प्रेम की कामना की। पूजा स्थल पर ग्रामीणों की भीड़ जुटी रही और पारंपरिक लोकगीतों से पूरा वातावरण भक्तिमय और उत्सवमय बना रहा।
